आज विगत की झान्झारियों पर कम्बु नए दमकते हैं,
और पुरानी दीवारों पर झालर नए लटकते हैं ||
रात घटित कुछ हुई विभा चंचल उमगी विश्वस्त प्रखर,
कुछ पेड़ों पर आये किसलय, उर में पराग स्वछन्द भ्रमर ||१||
किन्तु उर की कथा नहीं यह स्वमुख से कहने की है,
हाय ! करें क्या, दशा मौन भी तो यह ना रहने की है||
सच है आज स्वर नए , गीत उजले-उजले से लगते हैं,
और अकर्मों के प्याले धुंधले-धुंधले से लगते हैं ||२||
कुछ पल भर को संगीत नया उद्वेलित सा कर जाता है,
जब आती तब की याद हाय, उर; उर में ही कट जाता है ||
कुछ कहो; नहीं अब मौन रहो, इस विष को अवरोधूं कैसे?
संतप्त ह्रदय की पीड़ा को, तुम ही बोलो बोधूं कैसे? ||३||
जिस पथ पल निकल पड़े थे वर्षों पूर्व अबी भी बाकी है,
कुछ गलती अपनी हाय, और कुछ मौसम की बदहाली है ||
किन्तु शिखर शोभित, जगमग सा क्षितिज प्रभा उजलता है ,
देख उसे मन का वैभव, विश्वास हिलोरें लाता है ||४||
है सत्य शांति का पथ किंचित भी शांत नहीं रह पाता है,
आपद से धूमिल नर किन्तु कुछ और निखर सा आता है ||
हाँ, सुगम नहीं थी राह किन्तु अब शिखर प्रलोभन देता है,
उकसाता है, उत्साह गरज कर मन आतुर हो जाता है ||५||
कुछ चार घडी की रात अभी दो चार कदम बस चलना है,
नर की भारी उछ्वासों से व्याधि पाषाण पिघलना है ||
हाँ! वही श्रिंग जो धमक रहा विधु की धीमी सी काया में,
हो जाएगा लुप्त प्राप्त कर तुम्हे तुम्हारी माया में ||६||
और पुरानी दीवारों पर झालर नए लटकते हैं ||
रात घटित कुछ हुई विभा चंचल उमगी विश्वस्त प्रखर,
कुछ पेड़ों पर आये किसलय, उर में पराग स्वछन्द भ्रमर ||१||
किन्तु उर की कथा नहीं यह स्वमुख से कहने की है,
हाय ! करें क्या, दशा मौन भी तो यह ना रहने की है||
सच है आज स्वर नए , गीत उजले-उजले से लगते हैं,
और अकर्मों के प्याले धुंधले-धुंधले से लगते हैं ||२||
कुछ पल भर को संगीत नया उद्वेलित सा कर जाता है,
जब आती तब की याद हाय, उर; उर में ही कट जाता है ||
कुछ कहो; नहीं अब मौन रहो, इस विष को अवरोधूं कैसे?
संतप्त ह्रदय की पीड़ा को, तुम ही बोलो बोधूं कैसे? ||३||
जिस पथ पल निकल पड़े थे वर्षों पूर्व अबी भी बाकी है,
कुछ गलती अपनी हाय, और कुछ मौसम की बदहाली है ||
किन्तु शिखर शोभित, जगमग सा क्षितिज प्रभा उजलता है ,
देख उसे मन का वैभव, विश्वास हिलोरें लाता है ||४||
है सत्य शांति का पथ किंचित भी शांत नहीं रह पाता है,
आपद से धूमिल नर किन्तु कुछ और निखर सा आता है ||
हाँ, सुगम नहीं थी राह किन्तु अब शिखर प्रलोभन देता है,
उकसाता है, उत्साह गरज कर मन आतुर हो जाता है ||५||
कुछ चार घडी की रात अभी दो चार कदम बस चलना है,
नर की भारी उछ्वासों से व्याधि पाषाण पिघलना है ||
हाँ! वही श्रिंग जो धमक रहा विधु की धीमी सी काया में,
हो जाएगा लुप्त प्राप्त कर तुम्हे तुम्हारी माया में ||६||
2 comments:
darshan paakar tu arun ke swayam ko utsahit karta chal,
aur ram ja madira mein prayaas ki, tyaag chinta ka nishfal sthal
Jo shila mook achal ho kar bhi, hai damakti arunachal par
to khatm raat ko kar tu bhi, bas chhar kadam hi bachein hain, chall...
welcome back, though!!!
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